त्योहारजैन · श्वेतांबर
आयंबिल ओली
Ayambil Oli
अगली तारीख़
शनिवार, 17 अक्टूबर 2026
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संक्षेप में
आयंबिल ओली नौ दिन का जैन तप है, जिसमें आत्मशुद्धि और संयम के साथ जैन परंपरा के नौ परम पदों, यानी नवपद की आराधना की जाती है।
कथा
आयंबिल ओली नौ दिन का जैन तप है। इसमें आत्मशुद्धि, संयम और नवपद की आराधना होती है। नवपद यानी जैन परंपरा में पूजे जाने वाले नौ परम पद। आयंबिल में दिन में सिर्फ़ एक बार बहुत सादा भोजन किया जाता है। परंपरा के अनुसार इसमें तेल, घी, दूध से बनी चीज़ें, मिठाई और तेज़ मसाले नहीं लिए जाते। इस तप का उद्देश्य शरीर को सज़ा देना नहीं है। स्वाद और आराम का मोह कम हो और मन आत्मा की ओर मुड़े, यही इसका उद्देश्य है। कई श्वेतांबर संघों में ओली साल में दो बार होती है, आम तौर पर चैत्र और आश्विन में। हर दिन पूजा और स्वाध्याय में नवपद के एक-एक पद की आराधना होती है। ये नौ पद हैं अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु, और सम्यक दर्शन, ज्ञान, चारित्र और तप। इस तरह नौ दिन के नियम से संयम केवल आदर्श नहीं रहता, रोज़ का आचरण बन जाता है।
Gujarati household practice के आधार पर
महत्व
आयंबिल ओली करने वाले समुदाय के लिए यह तप ख़ास है, क्योंकि इससे धर्म, परिवार और संस्कृति की परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनी रहती है।
कैसे मनाते हैं
नौ दिन तक रोज़ एक ही समय भोजन किया जाता है। भोजन उबला हुआ होता है, और उसमें नमक, तेल, चीनी, दूध, दही, फल या मसाला नहीं होता। आम तौर पर गर्म पानी के साथ चावल, गेहूँ या दाल खाई जाती है। नौ साल में नौ ओली करके यह तप पूरा होता है। जैन मंदिर की आयंबिल शाला में यह भोजन बनता है, इसलिए तप करने वाले को घर के बाक़ी लोगों से अलग खाना नहीं पकाना पड़ता।
Gujarati household practice के आधार पर
अलग-अलग इलाक़ों में
ओली साल में दो बार आती है और दोनों बार नौ दिन की होती है। एक ओली चैत्र में चैत्र पूर्णिमा पर पूरी होती है, और दूसरी आश्विन में आश्विन पूर्णिमा पर। आश्विन की ओली नवरात्रि के दिनों में ही शुरू हो जाती है। इसलिए उन दिनों किसी जैन घर में आयंबिल का तप चल रहा होता है और पड़ोस के हिंदू घर में नवरात्रि का उत्सव।
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