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मेलागुजराती · हिंदू

चित्र विचित्र मेला

Chitra Vichitra Mela

अगली तारीख़

मंगलवार, 6 अप्रैल 2027

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संक्षेप में

साबरमती के किनारे एक रात शोक की, और अगली सुबह मेला।

कथा

यह मेला खेड़ब्रह्मा के पास गुणभाखरी में, साबरमती के किनारे लगता है। इसका नाम महाभारत के भाइयों चित्रवीर्य और विचित्रवीर्य पर पड़ा है। स्थानीय परंपरा के अनुसार दोनों भाइयों ने यहीं अपने प्राण त्यागे थे। मेला दो हिस्सों में होता है, और इनका क्रम मायने रखता है। अमावस्या की रात भील और गरासिया परिवारों की स्त्रियाँ नदी पर जाती हैं, और साल भर में जो भी गुज़र गया हो, उन सबके लिए साथ मिलकर ज़ोर-ज़ोर से रोती हैं। सुबह होते ही रोना थम जाता है और मेला शुरू हो जाता है। फिर नाच-गाना, ख़रीद-फ़रोख़्त और मनपसंद जीवनसाथी की तलाश चलती है।

महत्व

सार्वजनिक शोक और मेला एक ही मैदान पर 12 घंटे के अंतर से रखे गए हों, ऐसा शायद ही कहीं और मिलता है। दोनों हिस्से मिलकर ही यह परंपरा पूरी होती है, और सिर्फ़ दूसरे हिस्से के लिए जाने वाला इसका असली अर्थ चूक जाता है।

यह जानकारी अभी किसी जानकार ने जाँची नहीं है।

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