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देवशयनी एकादशी

Devshayani Ekadashi · Ashadhi Ekadashi · Hari Shayani Ekadashi

अगली तारीख़

बुधवार, 14 जुलाई 2027

सूर्योदय के समय की तिथि
शुक्ल एकादशी13:10 तक
नक्षत्र
अनुराधाअगले दिन 03:17 तक
मास
आषाढ
सूर्योदय
06:01सूर्यास्त 19:29
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संक्षेप में

देवशयनी एकादशी हिंदू पंचांग के अनुसार रखा जाने वाला एकादशी व्रत है, जिसकी तिथि और रीति-रिवाज क्षेत्र और स्थानीय पंचांग के हिसाब से अलग हो सकते हैं।

कथा

देवशयनी एकादशी की कथा राजा मांधाता से जुड़ी है। एक बार उनके राज्य में लंबा और भयंकर सूखा पड़ा। राजा ने बहुत प्रयास किए, पर यह संकट क्यों आया, इसका पता नहीं चला। राह पूछने के लिए मांधाता ऋषियों के पास गए। ऋषियों ने कहा कि प्रजा को साथ लेकर भगवान विष्णु की भक्ति में आषाढ शुक्ल एकादशी का व्रत करें। कथा है कि उस व्रत के बाद राज्य में फिर से वर्षा हुई और लोगों को राहत मिली। इस एकादशी का मौसम से जुड़ा अर्थ भी है। इसी दिन से चातुर्मास शुरू होता है। मान्यता है कि इन चार महीनों में भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में रहते हैं। इसलिए बहुत से समाज इस समय बड़े मांगलिक कामों की शुरुआत टालते हैं। इसके बजाय व्रत, यात्राओं में संयम, स्वाध्याय, भजन और नियम-पालन पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाता है। मांधाता की कथा मिल-जुलकर ज़िम्मेदारी निभाने की बात कहती है, और चातुर्मास शांत साधना के मौसम की शुरुआत है। यह दिन इन दोनों बातों को जोड़ता है।

Bhagavata Purana के आधार पर

महत्व

मान्यता है कि इस दिन से चार महीने बाद की प्रबोधिनी एकादशी तक भगवान विष्णु शयन करते हैं, और चातुर्मास शुरू होता है। इन महीनों में विवाह और गृहप्रवेश नहीं होते, और हो सके तो नई यात्रा भी शुरू नहीं की जाती। इस ठहराव की जड़ में खेती है। यह बरसात का मौसम है, और पहले रास्ते चलने लायक नहीं रहते थे।

उपवास

उपवास बाकी एकादशियों जैसा ही होता है। इस दिन की ख़ास बात वह है जो इसके बाद शुरू होती है। कई लोग इसी सुबह चार महीने का संकल्प लेते हैं। कुछ लोग कोई खाने की चीज़ छोड़ते हैं, कुछ कोई आदत, और कुछ रोज़ पाठ का नियम लेते हैं। यह संकल्प प्रबोधिनी एकादशी तक निभाया जाता है।

Gujarati household practice के आधार पर

अलग-अलग इलाक़ों में

महाराष्ट्र में यह आषाढी एकादशी कहलाती है, और इसी दिन पंढरपुर की वारी पूरी होती है। संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम की पादुकाएँ लेकर लाखों लोग पखवाड़े भर पैदल चलते हैं और इसी दिन पंढरपुर पहुँचते हैं। गुजरात में ऐसी यात्रा नहीं होती, वहाँ यह दिन चातुर्मास की शुरुआत के रूप में मनाया जाता है।

यह जानकारी अभी किसी जानकार ने जाँची नहीं है।

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