
संक्षेप में
नाग पंचमी नाग देवताओं की पूजा का पारंपरिक दिन है, जिसमें प्रकृति के प्रति आदर भी झलकता है।
कथा
नाग पंचमी पर हिंदू परंपरा के नाग देवताओं की पूजा होती है। इस त्योहार में धर्म, खेती और धरती पर हमारे साथ रहने वाले जीवों के प्रति आदर का पुराना रिश्ता दिखता है। एक प्रमुख कथा राजा जनमेजय के सर्पयज्ञ की है। उनके पिता की मृत्यु साँप के काटने से हुई थी, इसलिए क्रोध में आकर उन्होंने विशाल सर्पयज्ञ शुरू किया। अनगिनत नाग खिंचकर यज्ञ की आग की ओर आने लगे, तब युवा ऋषि आस्तीक ने बीच में पड़कर राजा को यज्ञ रोकने के लिए मना लिया, और नागवंश बच गया। एक और लोकप्रिय कथा में श्रीकृष्ण यमुना में विषैले कालिय नाग को वश में करते हैं, पर पूरे नागवंश का नाश नहीं करते। नाग पंचमी पर श्रद्धालु अनंत, वासुकि और तक्षक जैसे नागों की प्रतिमा या स्थान की पूजा करते हैं, फूल और पारंपरिक पकवान चढ़ाते हैं, और साँप के काटने से रक्षा व परिवार की कुशलता के लिए प्रार्थना करते हैं। बरसात में साँप ज़्यादा दिखते हैं, इसलिए किसान परिवारों में यह दिन साँपों को नुक़सान न पहुँचाने और संयम रखने की सीख भी देता है।
Mahabharata (Vyasa) के आधार पर
महत्व
नाग पंचमी का महत्व भक्ति में, पारिवारिक परंपरा में और इस दिन से जुड़े आध्यात्मिक या मौसमी अर्थ में है।
कैसे मनाते हैं
साँप के बिल पर दूध चढ़ाया जाता है, और जहाँ बिल न हो वहाँ पत्थर या मिट्टी की नाग-प्रतिमा पर। इस दिन ज़मीन न खोदी जाती है, न जोती जाती है, और उसमें कोई औज़ार भी नहीं चलाया जाता। गुजरात के कुछ हिस्सों में दरवाज़े के पास दीवार पर कुमकुम से नाग बनाया जाता है, और घर में जो भी पकता है, उसका पहला भोग उसे लगाया जाता है।
Gujarati household practice के आधार पर
अलग-अलग इलाक़ों में
महाराष्ट्र का बत्तीस शिराला कभी जीवित नागों के लिए प्रसिद्ध था, अब इस पर रोक है। गुजरात में यह दिन श्रावण शुक्ल पंचमी नहीं, भाद्रपद कृष्ण पंचमी (अमांत पंचांग में श्रावण कृष्ण पंचमी) है, यानी उत्तर भारत से पखवाड़ा भर बाद। अमांत और पूर्णिमांत पंचांगों का फ़र्क़ इतना साफ़ कम ही दिखता है। केरल में घर के अहाते में नागराज के स्थान होते हैं, जिनकी इस दिन पूजा होती है।
यह जानकारी अभी किसी जानकार ने जाँची नहीं है।
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