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पूर्णिमागुजराती · हिंदू

शरद पूर्णिमा

Sharad Purnima

अगली तारीख़

रविवार, 25 अक्टूबर 2026

39 दिन बाद
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संक्षेप में

आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को शरद ऋतु की उजली चाँदनी में भक्ति और मौसमी परंपराओं के साथ शरद पूर्णिमा मनाई जाती है।

कथा

शरद पूर्णिमा आश्विन शुक्ल पूर्णिमा की उजली रात है, जो सौंदर्य, समृद्धि और दिव्य प्रेम से जुड़ी है। वैष्णव परंपरा में यह रात वृंदावन में गोपियों के साथ श्रीकृष्ण के महारास की रात के रूप में याद की जाती है। महारास में हर गोपी को लगता है कि श्रीकृष्ण उसी के साथ हैं। इसलिए यह कथा साधारण प्रेम की नहीं, भगवान के प्रति पूर्ण प्रेम की प्रतीक मानी जाती है। कई इलाक़ों में इस रात को कोजागरी पूर्णिमा भी कहते हैं। यह नाम “कौन जाग रहा है?” वाले सवाल से बना है, और मान्यता है कि जो भक्त जागकर पूजा करते हैं, उन्हें माँ लक्ष्मी आशीर्वाद देती हैं। घरों में दूध या खीर, और गुजरात में दूध-पोहा, चाँदनी में रखकर बाद में प्रसाद के रूप में लिया जाता है। लोक-मान्यता है कि शरद की ठंडी चाँदनी में ख़ास पोषण होता है। इस तरह इस त्योहार में चंद्रमा की पूजा, लक्ष्मी-भक्ति, संगीत, रास और बरसात के बाद साफ़ आसमान की ख़ुशी एक साथ घुल-मिल जाती है।

Bhagavata Purana के आधार पर

महत्व

शरद पूर्णिमा का महत्व भक्ति में, पारिवारिक परंपरा में और इस दिन से जुड़े आध्यात्मिक या मौसमी अर्थ में है।

कैसे मनाते हैं

खीर या दूधपाक बनाकर पूरी रात चाँदनी में रखा जाता है और सुबह खाया जाता है। माना जाता है कि चाँद उसमें कुछ ख़ास भर देता है। लोग बाहर बैठते हैं, गीत गाते हैं और रात भर जागते हैं। गुजरात में नवरात्रि ख़त्म होने के कुछ ही दिन बाद आने वाली इस रात फिर से गरबा भी होता है।

Gujarati household practice के आधार पर

अलग-अलग इलाक़ों में

बंगाल और ओडिशा में इस रात कोजागरी लक्ष्मी पूजा होती है और रात भर जागरण होता है। नाम का मतलब ही है “कौन जाग रहा है?”, क्योंकि कहा जाता है कि इस रात माँ लक्ष्मी घूमने निकलती हैं और देखती हैं। गुजरात में गरबा-डांडिया के साथ नवरात्रि के बाद की यह आख़िरी रात मनाई जाती है। ब्रज में यह रात रास पूर्णिमा कहलाती है।

यह जानकारी अभी किसी जानकार ने जाँची नहीं है।

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