
संक्षेप में
थाईपुसम हिंदू पंचांग के अनुसार मनाया जाने वाला त्योहार है, जिसकी तिथि और रीति-रिवाज क्षेत्र व स्थानीय पंचांग के हिसाब से अलग हो सकते हैं।
कथा
थाईपुसम तमिल समाज का भगवान मुरुगन को समर्पित बड़ा त्योहार है। युवा योद्धा देव मुरुगन को कार्तिकेय या सुब्रह्मण्य के नाम से भी जाना जाता है। इस त्योहार का मुख्य पवित्र प्रतीक वेल है। वेल यानी दिव्य भाला, जो माता पार्वती ने मुरुगन को दिया था, ताकि वे विनाश करने वाली शक्तियों को हरा सकें। परंपरा में इन शक्तियों को बलशाली असुरों के रूप में बताया गया है। इसलिए इस त्योहार में लड़ने के लिए लड़ना नहीं, बल्कि दिव्य ज्ञान के दिखाए रास्ते पर चलने वाला साहस सराहा जाता है। भक्त प्रार्थना, शाकाहारी संयम और मन्नत के साथ तैयारी करते हैं। फिर कावड़ी, दूध के कलश या मन्नत की कोई और सेवा लेकर मुरुगन के मंदिरों तक जाते हैं। कुछ भक्त मन्नत पूरी करने के लिए कठिन तप भी करते हैं। भारत में मुरुगन के तमिल मंदिरों में, और मलेशिया, सिंगापुर, श्रीलंका व दूसरे देशों के तमिल समुदायों में यह त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है। थाईपुसम में पूरी हुई मनोकामनाओं के लिए आभार, मन की शुद्धि, और अहंकार, डर व बुरी आदतों पर जीत पाने का संकल्प व्यक्त होता है।
Gujarati household practice के आधार पर
महत्व
थाईपुसम का महत्व भक्ति में, पारिवारिक परंपरा में और इस दिन से जुड़े आध्यात्मिक या मौसमी अर्थ में है।
कैसे मनाते हैं
भक्त कंधे पर कावड़ी उठाते हैं। यह लकड़ी की सादी मेहराब भी हो सकती है, और त्वचा में पिरोए हुक और सलाखों पर टिका ढाँचा भी। कावड़ी उठाने वाला भावावेश में मंदिर तक चलता है, और आगे-आगे ढोल बजते हैं। कोई सिर मुँड़वाता है, सिर पर घड़े में दूध ले जाता है, और अंत में घड़े का दूध मूर्ति पर चढ़ाया जाता है।
Gujarati household practice के आधार पर
अलग-अलग इलाक़ों में
तमिलनाडु में पलनी और तिरुपरंकुंद्रम में यह त्योहार मनाया जाता है, पर विदेश में बसे तमिल समाज में यह कहीं ज़्यादा दिखाई देता है। कुआलालंपुर के बाहर बातू गुफाओं में दस लाख से ज़्यादा लोग पहुँचते हैं। सिंगापुर, मॉरीशस, दक्षिण अफ़्रीका और श्रीलंका में यह तमिल समाज का साल का सबसे बड़ा दिन है।
यह जानकारी अभी किसी जानकार ने जाँची नहीं है।
तिथि कैलेंडर आपके फ़ोन में
आपके अपने शहर का पंचांग, चौघड़िया, त्योहार और रिमाइंडर। ऐप इंटरनेट के बिना भी चलता है।