
त्योहारभारतीय · हिंदू
दुर्गा पूजा
Durga Puja
अगली तारीख़
शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026
संक्षेप में
दुर्गा पूजा हिंदू पंचांग के अनुसार मनाया जाने वाला त्योहार है, और इसकी तिथि व रीति-रिवाज क्षेत्र और स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग हो सकते हैं।
कथा
दुर्गा पूजा माँ दुर्गा की महिषासुर पर विजय का त्योहार है। बंगाल में इसके साथ एक कोमल भाव भी जुड़ा है कि इन दिनों माँ अपने बच्चों को लेकर मायके आती हैं। उत्सव महालया से शुरू होता है, फिर बोधन होता है, और षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी और नवमी बड़ी पूजा के दिन हैं। विजयादशमी को माँ को विदा किया जाता है। महीनों पहले से कारीगर मिट्टी से माँ दुर्गा और उनके परिवार की प्रतिमाएँ गढ़ते हैं, और मोहल्ले-मोहल्ले में भव्य पंडाल बनते हैं। इन पंडालों में पूजा के साथ कला, संगीत और पूरे समाज का मेल-जोल होता है। कथा है कि जब देवता स्वयं महिषासुर को नहीं हरा पाए, तब सब देवताओं की शक्ति एक होकर माँ दुर्गा के रूप में प्रकट हुई। अनेक अस्त्र-शस्त्र धारण किए सिंहवाहिनी माँ उसी एकजुट शक्ति का प्रतीक हैं, जो विनाशकारी अहंकार के सामने खड़ी होती है। दशमी को मिट्टी की प्रतिमाएँ शोभायात्रा के साथ ले जाकर जल में विसर्जित की जाती हैं, मानो जिन तत्वों से वे बनी थीं, उन्हीं में फिर मिल जाती हैं। यूनेस्को ने 2021 में कोलकाता की दुर्गा पूजा को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता दी। इसमें इस उत्सव की भक्ति की गहराई और पूरे समाज की मिलकर रची अद्भुत कला, दोनों का सम्मान हुआ।
Gujarati household practice के आधार पर
महत्व
दुर्गा पूजा का महत्व भक्ति, परिवार की परंपरा और इस दिन से जुड़े आध्यात्मिक या मौसमी अर्थ में है।
कैसे मनाते हैं
कुमारटुली में साल भर प्रतिमाएँ गढ़ी जाती हैं, और माँ की आँखें सबसे आख़िर में, महालया के दिन बनाई जाती हैं। षष्ठी को पंडाल खुलते हैं। अष्टमी को माँ को पुष्पांजलि दी जाती है, और हाथ में धुनुची लेकर उसके धुएँ के बीच नृत्य होता है। दशमी को प्रतिमा नदी ले जाने से पहले सुहागिन स्त्रियाँ माँ को और एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं।
Gujarati household practice के आधार पर
अलग-अलग इलाक़ों में
बंगाल, असम, ओडिशा और त्रिपुरा में नवरात्रि के आख़िरी पाँच दिन पंडालों और प्रतिमाओं के सार्वजनिक उत्सव के रूप में मनाए जाते हैं। गुजरात में वही नौ रातें गरबे की होती हैं। गंगा किनारे के उत्तर भारत में इन दिनों रामलीला होती है, और वहाँ उत्सव का अंत माँ की विदाई से नहीं, रावण-दहन से होता है। मैसूर के दशहरे में राज्य की भव्य सवारी निकलती है।
यह जानकारी अभी किसी जानकार ने जाँची नहीं है।
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