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ईद-उल-अज़हा

Eid al-Adha

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संक्षेप में

क़ुर्बानी का त्योहार ईद-उल-अज़हा पैग़ंबर इब्राहीम की याद दिलाता है, जो अल्लाह के हुक्म पर अपनी सबसे प्यारी चीज़ भी क़ुर्बान करने को तैयार हो गए।

कथा

ईद-उल-अज़हा को क़ुर्बानी का त्योहार कहा जाता है। यह दिन पैग़ंबर हज़रत इब्राहीम की याद दिलाता है, जो अल्लाह का हुक्म मानकर अपनी सबसे प्यारी चीज़ भी अर्पित करने को तैयार हो गए। इस्लामी परंपरा बताती है कि हज़रत इब्राहीम को सपने में अपने बेटे के बारे में अल्लाह का हुक्म मिला। जब पिता और बेटे दोनों ने अल्लाह की मर्ज़ी के आगे सिर झुका दिया, तब बेटे की जगह एक जानवर की क़ुर्बानी हुई। इसलिए यह कथा हिंसा का उत्सव नहीं है। यह अल्लाह पर भरोसे, हुक्म के पालन और रहम की कथा है। यह त्योहार हज के दिनों में आता है और मक्का में होने वाली हज की रस्मों से जुड़ा है। मुसलमान दिन की शुरुआत ईद की सामूहिक नमाज़ से करते हैं। जिनकी हैसियत हो और जहाँ स्थानीय नियम इजाज़त दें, वहाँ क़ुर्बानी की जाती है। क़ुर्बानी का गोश्त परिवार, पड़ोसियों और ख़ास तौर पर ज़रूरतमंदों में बाँटा जाता है, इसलिए उदारता इस त्योहार का ज़रूरी हिस्सा है। इस तरह ईद-उल-अज़हा निजी आस्था को समाज के प्रति ज़िम्मेदारी से जोड़ती है। यहाँ क़ुर्बानी का मतलब है मोह से ऊपर अल्लाह की भक्ति को रखना, और त्योहार की ख़ुशी को अपने घर से बाहर तक पहुँचाना।

Gujarati household practice के आधार पर

महत्व

ईद-उल-अज़हा मनाने वाले समाज के लिए यह दिन बहुत मायने रखता है, और धर्म, परिवार व संस्कृति की परंपरा को पीढ़ी दर पीढ़ी बनाए रखता है।

कैसे मनाते हैं

पहले ईद की नमाज़, फिर क़ुर्बानी। गोश्त के तीन हिस्से होते हैं, एक घर का, एक रिश्तेदारों और पड़ोसियों का, और एक ज़रूरतमंदों का। यह तीसरा हिस्सा देना ही होता है, यह मर्ज़ी की बात नहीं। हज पर गए लोग इसी दिन मिना में होते हैं।

Gujarati household practice के आधार पर

अलग-अलग इलाक़ों में

यह ईद हज से बँधी है, इसलिए तारीख़ सऊदी अरब में ज़िलहिज्जा का चाँद दिखने से तय होती है, और देशों के बीच ईद-उल-फ़ित्र से ज़्यादा एक जैसी रहती है। भारतीय उपमहाद्वीप में इसे बकरीद, पश्चिम अफ़्रीका में तबास्की, और तुर्की व बाल्कन में क़ुर्बान बायरामी कहते हैं।

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