त्योहारसिख
होला मोहल्ला
Hola Mohalla
अगली तारीख़
सोमवार, 22 मार्च 2027
- सूर्योदय के समय की तिथि
- पूर्णिमा16:13 तक
- नक्षत्र
- उत्तरा फाल्गुनी20:45 तक
- मास
- फाल्गुन
- सूर्योदय
- 06:41सूर्यास्त 18:52
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संक्षेप में
होला मोहल्ला युद्ध-कला, अनुशासन और संगत का सिख त्योहार है, जिसे गुरु गोबिंद सिंह जी ने अठारहवीं सदी की शुरुआत के आसपास आनंदपुर साहिब में शुरू करवाया था।
कथा
होला मोहल्ला युद्ध-कला, अनुशासन और संगत का सिख त्योहार है। गुरु गोबिंद सिंह जी ने अठारहवीं सदी की शुरुआत के आसपास आनंदपुर साहिब में इसकी शुरुआत करवाई थी। होली के ठीक बाद आने वाले इस त्योहार में होली का जोश एक नई दिशा में मुड़ा। युद्ध की तैयारी, घुड़सवारी, शस्त्र-अभ्यास और सामूहिक साहस के संगठित प्रदर्शन होने लगे। पारंपरिक निहंग दल आज भी गतका, घुड़सवारी और दूसरी युद्ध-कलाओं के प्रदर्शन में सबसे आगे दिखते हैं। साथ ही कीर्तन, कविता, धार्मिक प्रवचन और बड़े-बड़े लंगर भी चलते हैं। यह शौर्य आध्यात्मिक जीवन से अलग नहीं है। सिख शिक्षा के अनुसार ताक़त कमज़ोर पर राज करने के लिए नहीं, बल्कि दूसरों की रक्षा करने और अन्याय के सामने डटने के लिए है। आनंदपुर साहिब में भारी संगत जुटती है और जुलूस निकलते हैं। इस तरह होला मोहल्ला में संत की भक्ति और सिपाही का अनुशासन एक हो जाते हैं, और शारीरिक कौशल, निडरता, सेवा और आपसी एकजुटता का जश्न मनता है।
Gujarati household practice के आधार पर
महत्व
होला मोहल्ला मनाने वाले समुदाय के लिए यह त्योहार अहम है, और इससे धर्म, परिवार और संस्कृति की परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनी रहती है।
कैसे मनाते हैं
आनंदपुर साहिब में यह तीन दिन चलता है। निहंगों की घुड़सवारी, गतका, नेज़ाबाज़ी और कविता होती है, और अंत में गुरु ग्रंथ साहिब के पीछे जुलूस निकलता है। पूरे समय लंगर चलता है। रंग भी खेला जाता है, पर यह दिन उसके लिए नहीं है।
Gujarati household practice के आधार पर
अलग-अलग इलाक़ों में
मुख्य आयोजन पंजाब के आनंदपुर साहिब में तीन दिन चलता है, जहाँ लाखों लोगों का मेला लगता है। दूसरे गुरुद्वारों में यह कहीं ज़्यादा सादगी से मनाया जाता है। विदेश में बसे ज़्यादातर सिख समुदायों में यह मनाया ही नहीं जाता, और वहाँ जुलूस वैसाखी पर निकलता है।
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