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काली चौदस · नरक चतुर्दशी

Kali Chaudas / Naraka Chaturdashi

अगली तारीख़

शनिवार, 7 नवंबर 2026

52 दिन बाद
सूर्योदय के समय की तिथि
कृष्ण त्रयोदशी10:48 तक
नक्षत्र
चित्राअगले दिन 05:52 तक
मास
कार्तिकअमांत पंचांग में आश्विन
सूर्योदय
06:46सूर्यास्त 17:59
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संक्षेप में

काली चौदस, जिसे नरक चतुर्दशी भी कहते हैं, हिंदू पंचांग के अनुसार मनाया जाने वाला त्योहार है, और इसकी तिथि व रीति-रिवाज क्षेत्र और स्थानीय पंचांग के हिसाब से अलग हो सकते हैं।

कथा

गुजरात में काली चौदस दिवाली से पहले की कृष्ण चतुर्दशी को आती है, और देश के दूसरे हिस्सों में मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी भी इसी दिन होती है। इसकी मुख्य कथा श्रीकृष्ण और नरकासुर की है। नरकासुर एक शक्तिशाली राजा था। उसने बहुत से लोगों को बंदी बना रखा था और चारों ओर आतंक फैला रखा था। श्रीकृष्ण ने युद्ध में उसका वध किया और बंदियों को छुड़ाया। कई कथाओं में इस युद्ध में सत्यभामा की भी बड़ी भूमिका बताई जाती है। इसीलिए दिवाली की मुख्य रात से पहले का यह दिन अंधकार और विनाशकारी शक्तियों से मुक्ति से जुड़ गया। गुजरात में काली चौदस के नाम के साथ बुरी शक्तियों से रक्षा की परंपरा भी जुड़ी है, और स्थानीय रीति के अनुसार हनुमान जी, माँ काली या कुलदेवी की पूजा होती है। नरक चतुर्दशी पर तड़के तेल लगाकर स्नान करने की प्रथा भारत के कई इलाक़ों में है। इस दिन को सिर्फ़ जादू-टोने के डर से जोड़ना ठीक नहीं है। इसका बड़ा धार्मिक अर्थ शुद्धि, साहस और बुरी प्रवृत्तियों को दूर करना है, ताकि पूरा घर निर्मल मन और शुभ भाव के साथ दिवाली में प्रवेश करे।

Gujarati household practice के आधार पर

महत्व

काली चौदस यानी नरक चतुर्दशी का महत्व भक्ति, परिवार की परंपरा और इस दिन से जुड़े आध्यात्मिक या मौसमी अर्थ में है।

Gujarati household practice के आधार पर

कैसे मनाते हैं

सूर्योदय से पहले तेल और उबटन लगाकर स्नान किया जाता है। वड़े और दूसरे तले हुए पकवान चौराहे पर रखे जाते हैं या माँ काली के मंदिर में चढ़ाए जाते हैं। शाम को हनुमान जी के मंदिरों में भक्तों की भीड़ रहती है। गुजरात में दिवाली से पहले घर की आख़िरी और पूरी सफ़ाई इसी रात होती है।

Gujarati household practice के आधार पर

अलग-अलग इलाक़ों में

दक्षिण भारत और उत्तर के बड़े हिस्से में यही तिथि नरक चतुर्दशी के रूप में मनाई जाती है। वहाँ श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की याद में सूर्योदय से पहले तेल लगाकर स्नान किया जाता है। इस रात को माँ काली की रात मानने की परंपरा गुजरात की अपनी है। बंगाल की काली पूजा इसके बाद आने वाली अमावस्या को होती है।

यह जानकारी अभी किसी जानकार ने जाँची नहीं है।

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