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मिलाद-उन-नबी

Milad-un-Nabi

अभी कोई नियम नहीं

इसका नियम अभी किसी ने नहीं लिखा है, इसलिए कैलेंडर इसे किसी तारीख़ पर नहीं दिखाता। मनगढ़ंत तारीख़ के साथ नाम दिखाने से अच्छा है कि सिर्फ़ नाम दिखे।

इस परंपरा के जानकार चित्र की जाँच न कर लें, तब तक वह यहाँ नहीं दिखाया जाता।

संक्षेप में

इस्लामी परंपरा के अनुसार छठी सदी के आख़िर में मक्का के बनू हाशिम ख़ानदान में जन्मे पैग़ंबर मुहम्मद साहब का जन्मदिन मिलाद-उन-नबी या मौलिद के नाम से मनाया जाता है।

कथा

मिलाद-उन-नबी, जिसे मौलिद भी कहते हैं, पैग़ंबर मुहम्मद साहब के जन्म की याद में मनाया जाता है। इस्लामी परंपरा के अनुसार उनका जन्म छठी सदी के आख़िर में मक्का में बनू हाशिम ख़ानदान में हुआ था। आगे चलकर उन पर क़ुरआन की आयतें उतरीं। उन्होंने लोगों को एक अल्लाह की इबादत की ओर बुलाया, और नमाज़, दान, इंसाफ़, दया और कमज़ोर लोगों के प्रति ज़िम्मेदारी की सीख दी। पैग़ंबर साहब के जन्मदिन का सार्वजनिक जश्न शुरुआती मुस्लिम समाज में नहीं होता था, यह इस्लामी इतिहास में धीरे-धीरे शुरू हुआ। इसीलिए मौलिद को लेकर अलग-अलग मुस्लिम परंपराओं की राय अलग है। जहाँ यह दिन मनाया जाता है, वहाँ महफ़िलों में क़ुरआन की तिलावत, नात, पैग़ंबर साहब के जीवन और स्वभाव के प्रसंग, तक़रीरें, दान और मिल-बैठकर खाना होता है। मानने वालों के लिए यह सिर्फ़ जन्मदिन मनाने की बात नहीं है। यह पैग़ंबर साहब के प्रति मोहब्बत को फिर से ताज़ा करने और यह सोचने का दिन है कि करुणा, ईमानदारी और सेवा जैसे गुण रोज़ की ज़िंदगी में कैसे उतारे जाएँ।

Gujarati household practice के आधार पर

महत्व

मिलाद-उन-नबी मनाने वाले समाज के लिए यह दिन बहुत मायने रखता है, और धर्म, परिवार व संस्कृति की परंपरा को पीढ़ी दर पीढ़ी बनाए रखता है।

कैसे मनाते हैं

महफ़िलों और मस्जिदों में नातें और सीरत, यानी पैग़ंबर साहब की जीवनी, पढ़ी जाती हैं। भारत के कई शहरों में हरे झंडों के साथ जुलूस निकलते हैं। खाना बाँटा जाता है। गुजरात में इस दिन की सबसे ज़्यादा रौनक़ अहमदाबाद, भरूच और सूरत में दिखती है।

Gujarati household practice के आधार पर

अलग-अलग इलाक़ों में

यहाँ बात सिर्फ़ रीति-रिवाज के फ़र्क़ की नहीं है, इसे मनाने को लेकर ही असली मतभेद है। दक्षिण एशिया, मिस्र, तुर्की और पश्चिम अफ़्रीका के बरेलवी और सूफ़ी समुदाय इसे सार्वजनिक रूप से मनाते हैं। देवबंदी, सलफ़ी और वहाबी उलमा इस जश्न को धर्म में बाद में जोड़ी गई बिदअत मानते हैं और इसे नहीं मनाते। सऊदी अरब में यह दिन नहीं मनाया जाता, जबकि पाकिस्तान और बांग्लादेश में इस दिन सार्वजनिक छुट्टी होती है।

यह जानकारी अभी किसी जानकार ने जाँची नहीं है।

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