त्योहारइस्लामी
मुहर्रम · आशूरा
Muharram / Ashura
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संक्षेप में
आशूरा इस्लामी साल के पहले महीने मुहर्रम की दसवीं तारीख़ को आता है, और इस दिन से एक से ज़्यादा अहम अर्थ जुड़े हैं।
कथा
आशूरा इस्लामी साल के पहले महीने मुहर्रम की दसवीं तारीख़ को आता है, और इससे एक से ज़्यादा अहम अर्थ जुड़े हैं। शिया मुसलमानों के लिए यह सबसे बढ़कर इमाम हुसैन के ग़म का दिन है। पैग़ंबर मुहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन सन 680 ईस्वी में कर्बला में अपने छोटे-से क़ाफ़िले के साथियों के साथ शहीद हुए। जिस हुकूमत को वे नाइंसाफ़ मानते थे, उसके आगे झुकने से उन्होंने इनकार कर दिया था। उनका यह अडिग रुख़ हमेशा के लिए नैतिक साहस, क़ुर्बानी और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ डटे रहने की मिसाल बन गया। मजलिसों, मर्सियों और जुलूसों में कर्बला को याद किया जाता है, और अलग-अलग समुदायों में तरीक़े अलग हैं। सुन्नी परंपरा में आशूरा के दिन ऐच्छिक रोज़ा भी रखा जाता है। हदीसों में इस रोज़े को हज़रत मूसा और इस्राएलियों को फ़िरऔन से मिले छुटकारे के आभार से जोड़ा गया है। इन परंपराओं में अलग-अलग बातों पर ज़ोर रहा है। इसलिए आशूरा कर्बला की ग़मगीन याद का दिन भी है, और रोज़ा रखकर याद करने का दिन भी। दोनों में ईमान, इंसाफ़, सब्र और अल्लाह के सामने अपने कर्मों की जवाबदेही जैसे मूल्य साझा हैं।
Gujarati household practice के आधार पर
महत्व
मुहर्रम और आशूरा को मानने वाले समुदाय के लिए ये दिन अहम हैं, और इनसे धर्म, परिवार और संस्कृति की परंपरा बनी रहती है।
कैसे मनाते हैं
मुहर्रम की पहली दस रातों में मजलिसें होती हैं, और उनमें कर्बला की घटनाएँ फिर से बयान की जाती हैं। जुलूसों में अलम और ताज़िये निकलते हैं। ताज़िया इमाम हुसैन के मक़बरे का नमूना होता है। साथ में मातम किया जाता है। सड़कों पर पानी और शरबत बाँटा जाता है, क्योंकि कर्बला में शहादत से पहले पानी रोक दिया गया था।
Gujarati household practice के आधार पर
अलग-अलग इलाक़ों में
ये दोनों एक ही चीज़ के दो रूप नहीं हैं। एक जनाज़े जैसा मातम है, तो दूसरा रोज़ा। लखनऊ, हैदराबाद, कराची और खाड़ी देशों में शिया जुलूस खुलेआम और बहुत बड़े पैमाने पर निकलते हैं। इंडोनेशिया और उत्तरी अफ़्रीका के ज़्यादातर हिस्सों में यह दिन रोज़े के सिवा बिना किसी ख़ास आयोजन के गुज़र जाता है।
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