
संक्षेप में
दिवंगत परिजन तीन दिन घर आते हैं और लालटेनों के साथ विदा किए जाते हैं।
कथा
दिवंगत परिजन तीन दिन के लिए घर आते हैं और फिर विदा किए जाते हैं। परंपरा इसकी शुरुआत मौद्गल्यायन से मानती है। उन्होंने अपनी माँ को परलोक में दुख भोगते देखा। तब उनसे भिक्षु संघ को दान देने को कहा गया। माँ जब दुख से छूटीं, तो राहत में वे नाच उठे। कहा जाता है कि वही नाच बोन नृत्य है।
Gujarati household practice के आधार पर
महत्व
दिवंगत परिजन तीन दिन के लिए घर आते हैं। उन्हें राह दिखाने को स्वागत की आग जलती है। परिवार की क़ब्र साफ़ करके वहाँ जाया जाता है। फिर विदाई की आग या पानी में बहाई लालटेन उन्हें लौटा देती है। शाम का बोन ओदोरी नृत्य उन्हीं के लिए है, जिसे घेरे में जो भी आए, नाचता है।
कैसे मनाते हैं
शुरू में दरवाज़े पर स्वागत की आग जलती है और अंत में विदाई की आग। क़ब्रें साफ़ होती हैं और वेदी पर भोजन रखा जाता है। खुले में एक मचान के चारों ओर घेरे में बोन ओदोरी होता है, जिसमें जो भी आए, नाचता है। अंत में तोरो नागाशी होता है, यानी नदी में काग़ज़ की लालटेनें बहाई जाती हैं।
Gujarati household practice के आधार पर
अलग-अलग इलाक़ों में
जापान के ज़्यादातर हिस्सों में ओबोन अगस्त के बीच, टोक्यो और कांतो के कुछ हिस्सों में जुलाई के बीच, और ओकिनावा में पुरानी चंद्र तिथि पर होता है। यानी देश में यह तीन चरणों में मनाया जाता है। क्योटो में आख़िरी रात गोज़ान नो ओकुरिबी में पहाड़ियों पर आग से अक्षर उकेरे जाते हैं।
यह जानकारी अभी किसी जानकार ने जाँची नहीं है।
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