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रोश हशाना

Rosh Hashanah

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संक्षेप में

यहूदियों का नया साल रोश हशाना सृष्टि की रचना की ख़ुशी और ईश्वर के न्याय का दिन है, जिससे आत्मचिंतन और सही राह पर लौटने के पवित्र दिन शुरू होते हैं और लोग बीते साल का लेखा-जोखा करके सोचते हैं कि आगे जीवन में क्या बदलना है।

कथा

रोश हशाना यहूदियों का नया साल है। इसी से साल के सबसे पवित्र दिन शुरू होते हैं, जो अपने आचरण पर विचार करने और सही राह पर लौटने के दिन हैं। यहूदी परंपरा इस दिन को सृष्टि की रचना की ख़ुशी का दिन भी मानती है और ईश्वर के न्याय का समय भी। इसलिए लोग बीते साल का लेखा-जोखा करते हैं और सोचते हैं कि आगे जीवन में क्या बदलना है। इस दिन की सबसे ख़ास रस्म शोफ़ार बजाना है। शोफ़ार ज़्यादातर मेढ़े के सींग से बनता है और उसकी तीखी आवाज़ अंतरात्मा को जगाने के लिए होती है। सिनेगॉग की प्रार्थनाओं में ईश्वर की सत्ता, स्मरण और अपने कर्मों के हिसाब की बात होती है। घर पर खाने में अक्सर शहद में डुबोए सेब होते हैं और ऐसे दूसरे व्यंजन भी, जो साल मीठा बीतने की उम्मीद जताते हैं। कुछ समुदाय तश्लिख की रस्म करते हैं, जिसमें बहते पानी के पास जाकर अपनी ग़लतियाँ प्रतीक के रूप में फेंक दी जाती हैं। रोश हशाना ख़ुशी का त्योहार है, पर बेफ़िक्री का नहीं। ख़ुशी के साथ आत्मचिंतन, माफ़ी माँगना और बिगड़े रिश्ते सुधारने का फ़ैसला भी जुड़ा है। इसी दिन से प्रायश्चित के दस दिन शुरू होते हैं, जो योम किप्पुर तक चलते हैं।

Gujarati household practice के आधार पर

महत्व

रोश हशाना यहूदी समुदाय के लिए अहम दिन है, जो धर्म, परिवार और संस्कृति की परंपरा को पीढ़ी दर पीढ़ी बनाए रखता है।

कैसे मनाते हैं

दो दिन के इस त्योहार में शोफ़ार, यानी मेढ़े का सींग, सौ बार बजाया जाता है। मीठे साल के लिए सेब शहद में डुबोकर खाया जाता है, और गुँथी हुई नहीं, गोल चल्ला ब्रेड बनती है। बहते पानी के पास तश्लिख की प्रार्थना पढ़ी जाती है और साल भर की ग़लतियाँ वहीं बहा दी जाती हैं। भारत में मुंबई, कोलकाता और कोच्चि के यहूदी समुदाय यह त्योहार मनाते हैं।

Gujarati household practice के आधार पर

अलग-अलग इलाक़ों में

रोश हशाना लगभग हर जगह दो दिन मनाया जाता है, इज़राइल में भी। यह असामान्य है, क्योंकि ज़्यादातर त्योहारों का दूसरा दिन सिर्फ़ इज़राइल के बाहर मनाया जाता है। सेफ़ार्दी और मिज़राही समुदाय सिमानीम का सेदर करते हैं। इसमें एक के बाद एक व्यंजन परोसे जाते हैं और हर व्यंजन का अपना आशीर्वचन होता है। अश्केनाज़ी परंपरा में यह रस्म बस सेब और शहद तक रह गई है।

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