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षट्तिला एकादशी

Shattila Ekadashi

अगली तारीख़

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2027

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संक्षेप में

षट्तिला एकादशी हिंदू पंचांग के अनुसार रखा जाने वाला एकादशी व्रत है, और इसकी तिथि व रीति-रिवाज क्षेत्र और स्थानीय पंचांग के हिसाब से अलग हो सकते हैं।

कथा

षट्तिला एकादशी का नाम तिल के छह पारंपरिक उपयोगों से पड़ा है। इस दिन तिल मिले पानी से स्नान किया जाता है, शरीर पर तिल का उबटन लगाया जाता है, तिल मिला जल अर्पित किया जाता है, हवन में तिल डाले जाते हैं, तिल खाए जाते हैं और तिल का दान किया जाता है। इसकी कथा है कि एक ब्राह्मणी बड़ी धार्मिक थी। वह कठोर व्रत रखती थी, पर दूसरों को अन्न या काम की चीज़ शायद ही कभी देती थी। दान के बिना तप अधूरा है, यह समझाने के लिए भगवान विष्णु भिक्षुक का वेश धरकर उसके पास भिक्षा माँगने आए। ब्राह्मणी ने उन्हें सिर्फ़ मिट्टी का एक ढेला दे दिया। मृत्यु के बाद पुण्य के बल पर उसे स्वर्ग में घर तो मिला, पर वहाँ न अन्न था, न कोई सामान। तब उसने षट्तिला एकादशी की महिमा जानी और भक्ति के साथ तिल और दान से यह व्रत किया। इसके बाद उसका घर धन-धान्य से भर गया। यह कथा दान को व्रत का ज़रूरी हिस्सा बनाती है। धर्म की साधना केवल अपने को तपाने में नहीं, बल्कि अपना अन्न और साधन दूसरों के साथ बाँटने में भी है।

Padma Purana के आधार पर

महत्व

तिल छह तरह से काम आता है, नहाने के पानी में, हवन में, रसोई में, दान में, खाने में और अर्पण में। यह एकादशी माघ (अमांत पंचांग में पौष) की ठंड में आती है, जब मौसम के हिसाब से वैसे भी तिल और गुड़ खाए जाते हैं।

उपवास

तिल का छह तरह से उपयोग होता है, पर यह दिन असल में दान का है। तिल और गुड़ दान किए जाते हैं। गुजरात में यह एकादशी उत्तरायण के आसपास के दिनों में आती है, जब हर घर में तिल और गुड़ पहले से होते ही हैं।

Gujarati household practice के आधार पर

यह जानकारी अभी किसी जानकार ने जाँची नहीं है।

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