
व्रतभारतीय · हिंदू
शीतला अष्टमी
Sheetala Ashtami · बसोड़ा
अगली तारीख़
मंगलवार, 30 मार्च 2027
संक्षेप में
शीतला अष्टमी हिंदू पंचांग के अनुसार रखा जाने वाला व्रत है, और इसकी तिथि व रीति-रिवाज क्षेत्र और स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग हो सकते हैं।
कथा
शीतला अष्टमी, जिसे उत्तर भारत में कई जगह बसोड़ा कहते हैं, शीतला माता का व्रत है। शीतला माता रक्षा करने वाली माँ हैं, और पुराने समय से उन्हें बुख़ार, चेचक और बच्चों की बीमारियों से जोड़ा जाता रहा है। जब आधुनिक टीके नहीं थे, तब बार-बार फैलने वाली महामारियों के बीच जीते समाज ने ठंडक, सफ़ाई और रक्षा के इर्द-गिर्द गहरी आस्था वाली पूजा-विधियाँ बनाईं। शीतला नाम का अर्थ ही 'शीतल' है। लोक में चली आ रही व्रत की परंपरा कहती है कि माता के दिन ताज़ा खाना पकाने की गर्मी और भागदौड़ लेकर उनके पास नहीं जाना चाहिए। इसलिए परिवार एक दिन पहले ही खाना बना लेते हैं, चूल्हे को आराम देते हैं, और पूजा में ठंडा या पहले का बना भोजन चढ़ाते हैं। शीतला माता के चित्रों में अक्सर उनके हाथों में झाड़ू, कलश और सूप दिखता है। इन चीज़ों को सफ़ाई, ठंडक और रोग पर क़ाबू का प्रतीक माना जाता है। आज यह व्रत परिवार की सेहत, और ख़ासकर बच्चों की कुशलता की प्रार्थना के रूप में चलता है। साथ ही यह उस पुराने समाज की याद भी सँजोए रखता है, जिसने महामारियों का सामना अपने ढंग से किया।
महत्व
शीतला अष्टमी का महत्व भक्ति, परिवार की परंपरा और इस दिन से जुड़े आध्यात्मिक या मौसमी अर्थ में है।
कैसे मनाते हैं
इस दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता। एक दिन पहले बनी ठंडी रोटियाँ, मीठे चावल और दही खाए जाते हैं, और माता के स्थान पर ठंडा जल चढ़ाया जाता है।
यह जानकारी अभी किसी जानकार ने जाँची नहीं है।
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