
एकादशीगुजराती · हिंदू
वरूथिनी एकादशी
Varuthini Ekadashi
अगली तारीख़
रविवार, 2 मई 2027
- सूर्योदय के समय की तिथि
- कृष्ण एकादशी19:52 तक
- नक्षत्र
- पूर्वा भाद्रपदाअगले दिन 02:39 तक
- मास
- वैशाखअमांत पंचांग में चैत्र
- सूर्योदय
- 06:05सूर्यास्त 19:08
संक्षेप में
वरूथिनी एकादशी हिंदू पंचांग का एक एकादशी व्रत है, जिसकी तिथि और रीति-रिवाज़ क्षेत्र तथा स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग हो सकते हैं।
कथा
वरूथिनी एकादशी की प्रचलित व्रत कथा राजा मांधाता से जुड़ी है। कथा है कि धर्मात्मा राजा मांधाता नर्मदा के तट पर ध्यान और तप करते थे। एक बार जब वे तप में लीन थे, एक जंगली भालू ने उन पर हमला करके उनका पैर बुरी तरह घायल कर दिया। फिर भी राजा ने क्रोध नहीं किया और भगवान विष्णु का स्मरण करते रहे। भगवान विष्णु ने उनकी रक्षा की और समझाया कि यह कष्ट पूर्वकर्मों का फल है। फिर भगवान ने मांधाता को वरूथिनी एकादशी का व्रत रखने और वराह भगवान की पूजा करने को कहा। राजा ने वैसा ही किया और वे फिर से स्वस्थ हो गए। 'वरूथिनी' शब्द में रक्षा या कवच का भाव है, और कथा इस भाव को मन के भीतर ले जाती है। संकट में संयम भरा आचरण, धैर्य और भगवान की शरण ही सबसे मज़बूत कवच है। इस दिन भक्त विष्णु पूजा करते हैं, अन्न का त्याग करते हैं, क्रोध और भोग-विलास से दूर रहते हैं, दान देते हैं और स्थानीय पंचांग के अनुसार द्वादशी को पारण करते हैं।
Padma Purana के आधार पर
महत्व
यह व्रत रक्षा के लिए है, वरूथिनी यानी कवचधारी। कहते हैं यह व्रत कुछ पाने के लिए नहीं, जो मिला है उसे बचाने के लिए है। फल का वचन देने वाली दूसरी एकादशियों से यह इसी बात में अलग है।
उपवास
यह वैशाख कृष्ण पक्ष (अमांत पंचांग में चैत्र) की एकादशी है। वरूथिनी यानी कवच, और यह व्रत कठिन घड़ी आने के बाद नहीं, उससे पहले रखा जाता है।
Gujarati household practice के आधार पर
यह जानकारी अभी किसी जानकार ने जाँची नहीं है।
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