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वट पूर्णिमा

Vat Purnima

अगली तारीख़

शुक्रवार, 18 जून 2027

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संक्षेप में

वट पूर्णिमा हिंदू पंचांग का एक व्रत है, जिसकी तिथि और रीति-रिवाज़ क्षेत्र तथा स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग हो सकते हैं।

कथा

वट पूर्णिमा का व्रत महाभारत में आई सावित्री और सत्यवान की प्रसिद्ध कथा पर टिका है। सावित्री को पता चल गया था कि सत्यवान की आयु एक वर्ष से अधिक नहीं है, फिर भी उन्होंने जान-बूझकर सत्यवान को ही पति चुना। जब बताया हुआ दिन आया, सावित्री सत्यवान के साथ वन गईं और उनके प्राण निकलने तक उनके पास ही रहीं। यमराज सत्यवान के प्राण लेकर चले तो सावित्री उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं। उनकी बुद्धि, भक्ति और धर्म पर अडिग रहने से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें एक के बाद एक वरदान दिए। सावित्री ने सोच-समझकर ऐसे वर माँगे जिनसे उनके परिवार का सौभाग्य और भविष्य लौट आए, और अंत में यमराज को सत्यवान को जीवित करना ही पड़ा। इस व्रत में स्त्रियाँ बरगद की पूजा करती हैं। बरगद लंबे समय तक जीता है और उसकी जड़ें फैलती जाती हैं, इसलिए वह अटूट जीवन का प्रतीक है। स्त्रियाँ उसके तने पर पवित्र धागा लपेटती हैं और परिवार की कुशलता के लिए प्रार्थना करती हैं। यह कथा सावित्री को केवल पतिव्रता के रूप में नहीं, बल्कि साहस, विवेक और मृत्यु के सामने अडिग रहने के लिए याद करती है।

Mahabharata (Vyasa) के आधार पर

महत्व

वट पूर्णिमा भक्ति और पारिवारिक परंपरा का व्रत है, जिसके साथ आध्यात्मिक और मौसमी अर्थ भी जुड़ा है।

कैसे मनाते हैं

बरगद के चारों ओर धागा लपेटते हुए परिक्रमा की जाती है। महाराष्ट्र में अक्सर सब कुछ पाँच की गिनती में होता है, यानी पाँच फेरे, पाँच फल और पाँच तरह के अनाज। विवाहित स्त्रियाँ दिन भर उपवास रखती हैं और पूजा के बाद व्रत खोलती हैं। जिस परिवार में दोनों तिथियों पर व्रत रखा जाता है, वहाँ अक्सर बड़ी पीढ़ी अमावस्या को और नई पीढ़ी पूर्णिमा को व्रत रखती है।

Gujarati household practice के आधार पर

अलग-अलग इलाक़ों में

महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा और कर्नाटक में यह व्रत ज्येष्ठ पूर्णिमा को रखा जाता है। बिहार, उत्तर प्रदेश और ओडिशा में यही व्रत एक पखवाड़ा पहले, वट सावित्री अमावस्या को रखा जाता है। कथा वही, पेड़ वही, बस दोनों पंचांगों के बीच पखवाड़े भर का अंतर है।

यह जानकारी अभी किसी जानकार ने जाँची नहीं है।

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