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व्रतगुजराती · हिंदू

वट सावित्री

Vat Savitri · Vat Savitri Amavasya

अगली तारीख़

शुक्रवार, 4 जून 2027

सूर्योदय के समय की तिथि
अमावस्याअगले दिन 01:10 तक
नक्षत्र
कृत्तिका09:13 तक
मास
ज्येष्ठअमांत पंचांग में वैशाख
सूर्योदय
05:52सूर्यास्त 19:23
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संक्षेप में

वट सावित्री हिंदू पंचांग के अनुसार रखा जाने वाला व्रत है, जिसकी तिथि और रीति-रिवाज क्षेत्र व स्थानीय पंचांग के हिसाब से अलग हो सकते हैं।

कथा

वट सावित्री व्रत महाभारत की परंपरा में आने वाली सावित्री और सत्यवान की प्रसिद्ध कथा पर आधारित है। कथा है कि राजकुमारी सावित्री ने सत्यवान को पति के रूप में चुना। नारद मुनि ने चेताया था कि सत्यवान की आयु बस एक वर्ष की है, फिर भी सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रही। जब वह दिन आया, सावित्री सत्यवान के साथ वन में गई। एक पेड़ के नीचे सत्यवान ने प्राण त्यागे, तब वह उनके पास ही रही। फिर वह मृत्यु के देवता यमराज के पीछे-पीछे चल पड़ी और लौटने से मना कर दिया। सावित्री की समझदारी, पतिव्रत निष्ठा और दृढ़ता भरी बातों से यमराज प्रसन्न हुए और उसे एक के बाद एक वरदान देते गए। सावित्री ने चतुराई से ऐसे वर माँगे, जो सत्यवान के जीवित रहने पर ही पूरे हो सकते थे। इस तरह अंत में उसने अपने पति के प्राण वापस पा लिए। बरगद लंबी आयु वाला पेड़ है और उसकी जड़ें दूर-दूर तक फैलती हैं, इसलिए इस व्रत में वट वृक्ष की पूजा सबसे अहम है। सुहागिन स्त्रियाँ वट की पूजा करती हैं और सावित्री के साहस, बुद्धि और अटूट निष्ठा को याद करती हैं।

Mahabharata (Vyasa) के आधार पर

महत्व

वट सावित्री का महत्व भक्ति में, पारिवारिक परंपरा में और इस दिन से जुड़े आध्यात्मिक या मौसमी अर्थ में है।

कैसे मनाते हैं

सुहागिन स्त्रियाँ उपवास रखकर बरगद के पास जाती हैं। तने के चारों ओर विषम संख्या में फेरे लेकर धागा लपेटती हैं, और कथा सुनते हुए परिक्रमा करती हैं। जड़ में जल चढ़ाया जाता है। गुजरात और उत्तर भारत में यह व्रत ज्येष्ठ अमावस्या (अमांत पंचांग में वैशाख अमावस्या) को रखा जाता है। महाराष्ट्र में यही व्रत पंद्रह दिन बाद ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट पूर्णिमा के रूप में रखा जाता है।

Gujarati household practice के आधार पर

अलग-अलग इलाक़ों में

गुजरात और उत्तर भारत में यह व्रत इसी अमावस्या को रखा जाता है। पूर्व और दक्षिण भारत के बड़े हिस्से में यह पंद्रह दिन बाद की पूर्णिमा को वट पूर्णिमा के रूप में रखा जाता है। इसीलिए इस कैलेंडर में दोनों दिन अलग-अलग दिए गए हैं। बिहार और नेपाल में यह साल के बड़े स्त्री-व्रतों में से एक है।

यह जानकारी अभी किसी जानकार ने जाँची नहीं है।

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