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व्रतगुजराती · हिंदू

बछ बारस

Bachha Baras

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रविवार, 29 अगस्त 2027

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संक्षेप में

बछ बारस हिंदू पंचांग के अनुसार रखा जाने वाला व्रत है, जिसकी तिथि और रीति-रिवाज क्षेत्र व स्थानीय पंचांग के हिसाब से अलग हो सकते हैं।

कथा

बछ बारस गोवत्स द्वादशी का गुजराती रूप है। भाद्रपद कृष्ण द्वादशी (अमांत पंचांग में श्रावण कृष्ण द्वादशी) को रखा जाने वाला यह व्रत गाय को, और ख़ासकर बछड़े वाली गाय को समर्पित है। खेती पर टिके जीवन में गाय-बैल दूध देते थे, घर चलाने में सहारा बनते थे और खेती में काम आते थे। इसलिए उनकी पूजा श्रद्धा के साथ-साथ रोज़मर्रा के जीवन से उपजे आभार का तरीक़ा भी बन गई। महिलाएँ गाय और बछड़े की पूजा करती हैं, और गाय-बछड़ा न हों तो उनकी प्रतीक आकृति की पूजा होती है। उन्हें भोजन अर्पित किया जाता है, और संतान व परिवार की ख़ुशहाली के लिए प्रार्थना की जाती है। बछ नाम ही बछड़े की ओर इशारा करता है, इसलिए यह दिन मातृत्व, पोषण और संतान की रक्षा से और गहराई से जुड़ जाता है। कई समुदायों में व्रत के तौर पर इस दिन गाय के दूध से बनी चीज़ें या कुछ अनाज नहीं खाए जाते। इस तरह इस व्रत में उन पशुओं और पोषण के स्रोतों के प्रति आभार जताया जाता है, जिन पर घर की समृद्धि टिकी है।

महत्व

बछ बारस का महत्व भक्ति में, पारिवारिक परंपरा में और इस दिन से जुड़े आध्यात्मिक या मौसमी अर्थ में है।

उपवास

इस दिन भोजन नहीं छोड़ा जाता, पर गेहूँ और चाकू से कटी कोई चीज़ नहीं खाई जाती। बाजरे या ज्वार का रोटला और हाथ से तोड़ी सब्ज़ी खाई जाती है।

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