
त्योहारईसाई
ईस्टर
Easter
अभी कोई नियम नहीं
इसका नियम अभी किसी ने नहीं लिखा है, इसलिए कैलेंडर इसे किसी तारीख़ पर नहीं दिखाता। मनगढ़ंत तारीख़ के साथ नाम दिखाने से अच्छा है कि सिर्फ़ नाम दिखे।
संक्षेप में
ईस्टर ईसाइयों का सबसे मुख्य त्योहार है, जिसमें यीशु मसीह के मृत्यु के बाद फिर से जी उठने का उत्सव मनाया जाता है, और सुसमाचारों के अनुसार यीशु को क्रूस पर चढ़ाकर दफ़नाए जाने के बाद सप्ताह के पहले दिन तड़के उनकी अनुयायी स्त्रियाँ कब्र पर पहुँचीं तो कब्र ख़ाली थी।
कथा
ईस्टर ईसाइयों का सबसे मुख्य त्योहार है। इस दिन यीशु मसीह के पुनरुत्थान का, यानी मृत्यु के बाद उनके फिर से जी उठने का उत्सव मनाया जाता है। सुसमाचारों में लिखा है कि यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया और कब्र में रखा गया। सप्ताह के पहले दिन तड़के उनकी अनुयायी स्त्रियाँ कब्र पर पहुँचीं तो कब्र ख़ाली थी। वहीं उन्हें संदेश मिला कि यीशु जी उठे हैं। नया नियम बताता है कि इसके बाद जी उठे यीशु ने अपने शिष्यों को दर्शन दिए। ईसाइयों के लिए यह केवल मृत्यु से लौट आने की घटना नहीं है। यही उनके इस विश्वास की नींव है कि पाप और मृत्यु की जीत अंतिम नहीं है, और मसीह के द्वारा नया जीवन संभव है। ईस्टर पवित्र सप्ताह और गुड फ़्राइडे के शोक के बाद आता है, इसलिए अंधकार से आनंद की ओर बढ़ना ही इसका मूल भाव है। चर्चों में रात का जागरण, घंटियों की ध्वनि, भजन, धर्मग्रंथ का पाठ और यूखरिस्त या प्रभु भोज होता है। परिवार साथ बैठकर त्योहार का भोजन करते हैं। अंडे और नए जीवन के दूसरे प्रतीक भी लोक परंपरा में लोकप्रिय हो गए हैं। ईस्टर की तारीख़ हर साल बदलती है, क्योंकि यह ईसाई परंपरा की पास्का गणना से तय होती है।
Gujarati household practice के आधार पर
महत्व
ईस्टर मनाने वाले समाज के लिए यह अहम दिन है। इससे धर्म, परिवार और संस्कृति की परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी बनी रहती है।
कैसे मनाते हैं
शनिवार की रात जागरण की प्रार्थना होती है, जिसमें एक ही मोमबत्ती से सारी मोमबत्तियाँ जलती हैं, और सुबह पहली प्रार्थना होती है। लेंट के उपवास पूरे होते हैं। रंगे हुए या उपहार में दिए अंडे इसकी पुरानी निशानी हैं। केरल और गोवा में परिवार साथ भोजन करते हैं, जिससे चालीस दिन का संयम टूटता है।
Gujarati household practice के आधार पर
अलग-अलग इलाक़ों में
ईस्टर की तारीख़ 21 मार्च को या उसके बाद की पहली पूर्णिमा के बाद का पहला रविवार होती है, इसलिए यह पाँच सप्ताह के दायरे में घूमती रहती है। ऑर्थोडॉक्स चर्च यही नियम जूलियन कैलेंडर पर गिनते हैं और उनका ईस्टर आम तौर पर एक से पाँच सप्ताह बाद आता है। इसीलिए एक ही शहर में दो बार मनाए जाने की सबसे ज़्यादा संभावना ईस्टर की होती है।
यह जानकारी अभी किसी जानकार ने जाँची नहीं है।
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