
मेलाबौद्ध
हेमिस उत्सव
Hemis Festival
अभी कोई नियम नहीं
इसका नियम अभी किसी ने नहीं लिखा है, इसलिए कैलेंडर इसे किसी तारीख़ पर नहीं दिखाता। मनगढ़ंत तारीख़ के साथ नाम दिखाने से अच्छा है कि सिर्फ़ नाम दिखे।
संक्षेप में
हेमिस उत्सव या हेमिस त्सेचु लद्दाख के बौद्ध मठों के सबसे जाने-माने त्योहारों में से एक है, जो हेमिस मठ में तिब्बत और हिमालयी इलाक़े में वज्रयान बौद्ध धर्म की स्थापना में मदद करने वाले पूज्य गुरु पद्मसंभव के सम्मान में मनाया जाता है।
कथा
हेमिस उत्सव, जिसे हेमिस त्सेचु भी कहते हैं, लद्दाख के हेमिस मठ में गुरु पद्मसंभव के सम्मान में मनाया जाता है। तिब्बत और हिमालयी इलाक़े में वज्रयान बौद्ध धर्म की स्थापना में मदद करने वाले गुरु के रूप में पद्मसंभव पूजे जाते हैं, और यह उत्सव लद्दाख के बौद्ध मठों के सबसे जाने-माने त्योहारों में गिना जाता है। उत्सव में मठ का आँगन मंच बन जाता है, जहाँ भव्य पोशाकें और मुखौटे पहने भिक्षु छाम नृत्य करते हैं। इन धार्मिक नृत्यों में रक्षक देवता, बुरी शक्तियों पर जीत, और यह बौद्ध शिक्षा दिखाई जाती है कि अज्ञान और आसक्ति को प्रज्ञा से बदला जा सकता है। नृत्य के साथ लंबे नरसिंगे, झाँझ और ढोल बजते हैं, और श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए पवित्र मूर्तियाँ और पूजा की वस्तुएँ रखी जाती हैं। कुछ ख़ास वर्षों में पद्मसंभव का विशाल थांगका, यानी कपड़े पर बना धार्मिक चित्र, विधि-विधान से खोलकर दिखाया जाता है। तीर्थयात्री और सैलानी सिर्फ़ तमाशा देखने नहीं आते, आशीर्वाद लेने और उपदेश सुनने भी आते हैं। इस तरह हेमिस त्सेचु में भक्ति, मठ के अनुष्ठान, धार्मिक नाट्य, संगीत और लद्दाख की जीवित हिमालयी बौद्ध विरासत एक साथ दिखती है।
Gujarati household practice के आधार पर
महत्व
हेमिस उत्सव मनाने वाले समाज के लिए यह बहुत मायने रखता है, और धर्म, परिवार व संस्कृति की परंपरा को पीढ़ी दर पीढ़ी बनाए रखता है।
कैसे मनाते हैं
मठ के आँगन में छाम नृत्य होता है। ज़रीदार पोशाक और नक़्क़ाशीदार मुखौटे पहने भिक्षु लंबे नरसिंगों और झाँझ की ताल पर बाधाओं को वश में करने का दृश्य रचते हैं, और अंत में एक पुतले को नष्ट किया जाता है। हर बारह साल में, वानर वर्ष में, विशाल थांगका मठ की दीवार पर ऊपर से नीचे तक खोला जाता है।
Gujarati household practice के आधार पर
अलग-अलग इलाक़ों में
यह उत्सव सिंधु नदी के ऊपर बसे हेमिस गोंपा में तिब्बती पंचांग के पाँचवें महीने के दसवें दिन मनाया जाता है। हर तीसरे साल पद्मसंभव का दो मंज़िल ऊँचा थांगका मठ की दीवार पर खोला जाता है, और उसी साल सबसे ज़्यादा भीड़ आती है।
यह जानकारी अभी किसी जानकार ने जाँची नहीं है।
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