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जन्माष्टमी

Janmashtami

अगली तारीख़

बुधवार, 25 अगस्त 2027

सूर्योदय के समय की तिथि
कृष्ण अष्टमी19:20 तक
नक्षत्र
कृत्तिका12:27 तक
मास
भाद्रपदअमांत पंचांग में श्रावण
सूर्योदय
06:18सूर्यास्त 19:05
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संक्षेप में

जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का त्योहार है, जिसे भक्त उपवास रखकर और रात में भजन के साथ जागरण करके भक्ति भाव से मनाते हैं।

कथा

जन्माष्टमी श्रीकृष्ण के जन्म की कथा है। उस समय मथुरा में राजा कंस का राज था। कंस के लिए भविष्यवाणी हुई कि उसकी बहन देवकी की आठवीं संतान ही उसकी मृत्यु का कारण बनेगी। डरे हुए कंस ने देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में डाल दिया और उनके जो भी बच्चे जन्मे, उन्हें मार डाला। आठवीं संतान के रूप में आधी रात को श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तब चमत्कार हुआ। बेड़ियाँ अपने आप खुल गईं और कारागार के द्वार भी खुल गए। वसुदेव नवजात श्रीकृष्ण को लेकर उफनती यमुना पार करके गोकुल पहुँचे। वहाँ उन्होंने श्रीकृष्ण को नंद और यशोदा के घर छोड़ा और उनकी नवजात बेटी को अपने साथ ले आए। कंस ने उस बच्ची को मारना चाहा, तो वह देवी के रूप में प्रकट हुई और कंस को चेताया कि उसे हराने वाला बालक तो सुरक्षित पहुँच चुका है। फिर श्रीकृष्ण गोकुल और वृंदावन में ग्वालों के बीच बड़े हुए और समय आने पर कंस का सामना किया। भय और अत्याचार के समय में भगवान रक्षा करने और धर्म की स्थापना के लिए अवतरित हुए, इसी भाव से जन्माष्टमी पर इस जन्म को याद किया जाता है।

Bhagavata Purana के आधार पर

महत्व

जन्माष्टमी का महत्व भक्ति में, परिवार की परंपरा में और इस दिन के आध्यात्मिक या ऋतु से जुड़े अर्थ में है।

कैसे मनाते हैं

बहुत से लोग दिन भर उपवास रखते हैं और आधी रात को, श्रीकृष्ण के जन्म की घड़ी में, उपवास खोलते हैं। उसी घड़ी मंदिरों में दर्शन होते हैं। दही और माखन से भरी मटकियाँ ऊँचाई पर टाँगी जाती हैं, और टोलियाँ एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर उन्हें फोड़ती हैं। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण माखन चुराते थे, और इस खेल का नाम उसी माखन से पड़ा है।

Gujarati household practice के आधार पर

अलग-अलग इलाक़ों में

महाराष्ट्र और गुजरात में दही हांडी होती है, जिसमें लोग मानव पिरामिड बनाकर गली के आर-पार टँगी मटकी तक पहुँचते हैं। मथुरा और वृंदावन इसे श्रीकृष्ण की जन्मभूमि के रूप में मनाते हैं। दक्षिण में यह गोकुलाष्टमी है, जहाँ दरवाज़े से भीतर की ओर कोलम से पैरों के निशान बनते हैं। मणिपुर में यह रासलीला के साथ मनाई जाती है। गुजरात में यह द्वारका के जन्माष्टमी मेले का आख़िरी दिन भी है।

यह जानकारी अभी किसी जानकार ने जाँची नहीं है।

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