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पितृ पक्ष

Pitru Paksha · Shraddha Paksha · Mahalaya Paksha

अगली तारीख़

शनिवार, 26 सितंबर 2026

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संक्षेप में

पितृ पक्ष पूर्वजों को याद करने और उनके लिए श्राद्ध व तर्पण करने का पखवाड़ा है।

कथा

पितृ पक्ष पूर्वजों को याद करने का पखवाड़ा है। इन दिनों श्राद्ध, तर्पण और दान किया जाता है। इसकी भावना समझाने वाली एक प्रचलित कथा महाभारत के कर्ण से जुड़ी है। कथा है कि मृत्यु के बाद पितृलोक में कर्ण को सोना और रत्न तो मिले, पर खाने के लिए अन्न नहीं मिला। कारण यह था कि जीवन भर उन्होंने धन का खुलकर दान किया था, पर अपने पितरों के लिए जान-बूझकर कभी अन्न अर्पित नहीं किया था। तब उन्हें कुछ समय के लिए धरती पर लौटकर पितरों की याद में अन्न और जल अर्पित करने की अनुमति मिली। लोक-परंपरा में यही समय पितृ पक्ष से जुड़ गया। कथा से आगे देखें तो यह पखवाड़ा याद दिलाता है कि हर परिवार पीढ़ियों की एक कड़ी है। लोग माता-पिता और पुरखों को याद करते हैं, तिल मिला जल अर्पित करते हैं, श्राद्ध का भोजन बनाते हैं, ब्राह्मणों या ज़रूरतमंदों को भोजन कराते हैं और दान देते हैं। यह सब आम तौर पर परिजन की मृत्यु-तिथि पर होता है।

Mahabharata (Vyasa) के आधार पर

महत्व

पितृ पक्ष का महत्व भक्ति में, पारिवारिक परंपरा में और इन दिनों से जुड़े आध्यात्मिक या मौसमी अर्थ में है।

कैसे मनाते हैं

हर पितर का श्राद्ध उसी तिथि पर किया जाता है, जिस तिथि पर उनका देहांत हुआ था। तिल मिला जल अर्पित किया जाता है। भोजन बनाकर ब्राह्मण को खिलाया जाता है और कौए के लिए ग्रास निकाला जाता है, जो छत या दीवार पर रख दिया जाता है। इस पखवाड़े में कोई नया काम शुरू नहीं होता, इसलिए विवाह, नई ख़रीदारी और गृहप्रवेश टाले जाते हैं। पितृ पक्ष ख़त्म होने की अगली सुबह नवरात्रि शुरू होती है।

Gujarati household practice के आधार पर

अलग-अलग इलाक़ों में

सबसे ज़्यादा लोग गया जाते हैं, जहाँ फल्गु के तट पर पिंडदान होता है। दक्षिण में इसे महालय पक्ष कहते हैं और उत्तर में सोलह श्राद्ध। बंगाल में यह महालया पर पूरा होता है, और उस दिन भोर का प्रसारण दुर्गा पूजा की शुरुआत कराता है। श्राद्ध मृत्यु-तिथि पर ही होता है, इसलिए एक ही परिवार में अलग-अलग लोगों के श्राद्ध के दिन अलग होते हैं।

यह जानकारी अभी किसी जानकार ने जाँची नहीं है।

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